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देश में रिकवरी रेट बढ़ रहा है, लॉकडाउन में लोगों ने वायरस से लड़ना सीखा और अनलॉक-1 में भी वही सावधानी बरतनी जरूरी : एक्सपर्ट

देश मेंलॉकडाउन का कितना असर पड़ा, रिकवरी रेट बढ़ने के क्या मायने हैं और नीले या सफेद में से कौन सा सैनेटाइजर बेहतर है, ऐसे कई सवालों के जवाब जीबी पंत हॉस्पिटल, नई दिल्ली के विशेषज्ञप्रोफेसर संजय पांडेय ने आकाशवाणी को दिए। जानिए कोरोना से जुड़े सवाल और एक्सपर्ट के जवाब-

#1) लॉकडाउन संक्रमण को रोकने में अब तक कितना कारगर रहा?
अगर लॉकडाउन नहीं होता तो देश में कोरोना के मामले अधिक होते और मौत भी ज्यादा होतीं। लॉकडाउन के कारण ही मामले कंट्रोल हो पाए और लोग वायरस के प्रति गंभीर हुए। हमें अपने ट्रेंड का पता चला। आज हमारे यहां 1.7 लाख केस हैं उनमें से कितने सिम्प्टोमैटिक हैं, किनको ऑक्सीजन की जरूरत है, किसे वेंटिलेटर पर रखना है, यह सब लॉकडाउन के दौरान पता कर पाए। इसी के मुताबिक निर्णय लिए गए।

#2) 68 दिनों के लॉकडाउन का लोगों पर मनोवैज्ञानिक रूप से क्या असर पड़ा है?
अगर कोई पूरे दिन घर के अंदर रहता है तो कई तरह के विरोध और तनाव देखने को मिलते हैं। इस दौरान घरेलू हिंसा के मामले भी ज्यादा आए हैं। लेकिन मामले दूसरे देशों की तुलना में भारत में कम हैं क्योंकि हमारे यहां संयुक्त परिवार की परम्परा रही है। बच्चों की परीक्षाएं कैंसिल हो गई हैं और कई लोगों की नौकरी या व्यापार को लेकर कुछ मनोवैज्ञानिक असर पड़ा है।

#3) भारत में रिकवरी रेट बढ़ रहा है, इसे कैसे देखते हैं?
हमारे देश में रिकवरी रेट लगभग 47 फीसदी से ज्यादा है। यह रिकवरी रेट बताता है कि हमारे यहां संक्रमण की दर यूरोप और यूएस जैसी नहीं है। मामलों की संख्या, आईसीयू सपोर्ट, ऑक्सीजन सप्लाई या हॉस्पिटलाइजेशन, बाकी देशों की तुलना में हमारे यहां काफी कम है। ये एक सकारात्मक बात है। उम्मीद है रिकवरी रेट और बढ़ेगा। लोग अब जागरुक हो गए हैं। वायरस से कैसे लड़ना है और खुद को कैसे सुरक्षित रखना है, वे समझ रहे हैं।

#4) लॉकडाउन को खोलने के पहले चरण अनलॉक-1 की ढील को कैसे देखते हैं?
सरकार ने लॉकडाउन में ढील दी है। इसका लक्ष्य जीवन को सामान्य बनाना है। इससे लोगों में वायरस के संक्रमण को लेकर भय और तनाव कम होगा। अन्य देशों की तुलना में अपने देश के केस देखें तो हमारे यहां मृत्यु दर कम है। इस वजह से लोग धीरे-धीरे अपने काम शुरू कर सकते हैं ताकि अर्थव्यवस्था के साथ जिंदगी भी सामान्य हो। कोरोना जल्द जाने वाला नहीं है। अनलॉक-1 में भी मास्क पहनने के साथ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना जरूरी है।

#5)बाजार में दो तरह के सैनेटाइजर हैं, कौन सा ज्यादा अच्छा है?
बाजार में अलग-अलग केमिकल के हिसाब से नीला-सफेद करके सैनेटाइजर बेचते हैं। लेकिन अधिकांश सैनेटाइजर अल्कोहल बेस्ड होते हैं, इसलिए जो भी मिले उसका प्रयोग कर सकते हैं लेकिन साबुन-पानी मिले तो उससे हाथ धोना बेहतर है।

#6)संक्रमण होने के कितने दिन बाद टेस्ट पॉजिटिव आता है?
संक्रमित होने के बाद लक्षण दिखने में 14 दिन तक का समय लगता है। लेकिन सामान्य रूप से 3-4 दिन में लक्षण आ जाते हैं। फिर भी यह लोगों की इम्युनिटी पर निर्भर करता है कि उनके अंदर कितने दिन में लक्षण दिखते हैं। क्योंकि शरीर में इम्युनिटी एंटीबॉडी बनाती है जो शरीर के अंदर वायरस से लड़ती है।

#7) एसिम्प्टोमैटिक कैरियर से कैसे बचें?
जांच किए बिना यह पता नहीं चल पाता है कि कोई संक्रमित है या नहीं। सिम्प्टोमैटिक लोगों में लक्षण दखते हैं, वो खांसते हैं, छीकते हैं। लेकिन एसिम्प्टोमैटिक लोगों में कोई लक्षण नहीं दिखते हैं। उनसे संक्रमण होने का खतरा कम है क्योंकि वे खांसते-छींकते नहीं है। इसलिए बहुत ज्यादा पैनिक होने की जरूरत नहीं। सावधानी रखें, मास्क का प्रयोग करें और सुरक्षित दूरी बनाकर रखें।



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