Breaking News

कोई भी जांच 100% सटीक नहीं, फॉल्स निगेटिव रिपोर्ट सबसे बड़ी परेशानी; वैज्ञानिकों ने वायरस के पकड़ में न आने की 3 वजह गिनाईं

दुनियाभर के विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोनावायरस को जड़ से खत्म करने में फॉल्सनिगेटिव रिपोर्ट बड़ी बाधा बन रही है। ऐसीरिपोर्ट का मतलब, वोमरीज जो कोरोनावायरस से संक्रमिततो है लेकिन कई बारजांच में वायरस की मौजूदगीका पता नहीं चलता। वैज्ञानिकों का कहना है, कोविड-19 के बदलते स्ट्रेन के कारणकोई भी जांच 100 फीसदी सटीक नहींहै।

संक्रमण रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया सम्पतकुमार का कहना है कि सटीक जांच के लिए करने वाले काप्रशिक्षित होना औरसैम्पलिंग के दौरान दी गई गाइडलाइन का पालन करना बेहद जरूरी है। इसी वजह से अमेरिका में कोरोना की जांच के लिए सामान्य स्टॉफ नहीं बल्कि प्रशिक्षितफार्मासिस्ट नियुक्त किए जा रहे हैं।

जांच के बाद भी वायरस पकड़ न आने की 3 बड़ी वजह एक्सपर्ट से समझिए-


1- सैम्पल लेने का गलत तरीका
मेयो क्लीनिक की संक्रमण रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया का कहना है कि जांच में वायरस पकड़ में आ रहा है या नहीं इसकी कई वजह हो सकती हैं। यहइस बात पर निर्भर करता है कि शरीर में वायरस संक्रमण कितना फैलाहै। जैसे लक्षण खांसी-छींक तक सीमित हैं या शरीर के दूसरे अंग भी प्रभावित होरहे हैं। दूसरा, अहम पहलू है कि जांच का सैम्पल किस तरह लिया गया है। गले से स्वाब सैम्पल (लार का नमूना) लेते वक्त सभी जरूरी सावधानी बरती गई हैं यानहीं। इसके अलावा इस सैम्पल को लैब तक पहुंचने में कितना समय लगा है।

डॉ. प्रिया कहती हैं, पिछले 5 महीने से कोरोनावायरस इंसानों को संक्रमित कर रहा है इसलिए सटीक जांच सबसे जरूरी पहलू है। दुनियाभर में अलग-अलग कम्पनियां जो जांच कर रही हैं उनका तरीका एक-दूसरे से थोड़ा अलग भी है। इसलिए एक सटीक आंकड़ा पेश करना भी मुश्किल है। एक अनुमान केमुताबिक, कैलिफोर्निया में कोविड-19 के मामले मध्य मई 2020 तक 50 फीसदी बढ़ सकते हैं।


2- वायरस का एक से दूसरे हिस्से में पहुंचना
वैज्ञानिकों के मुताबिक, कोरोनावायरस के संक्रमण का दायरा धीरे-धीरे बढ़ता है। वायरस शरीर के ऊपरी हिेस्से (नाक, मुंह) से निकलते हुए फेफड़ों तक पहुंचता है।इस स्थिति में कोरोना शरीर में मौजूद होने के बाद भी स्वाब सैम्पल निगेटिव आ सकता है। अगर लक्षण दिख रहे हैं तो लगातार तीन बार स्वाब सैम्पल लिया जाताहै। टेस्ट निगेटिव आने पर इस बार मरीज के फेफड़ों से सैम्पल लिया जाता है।

जॉनहॉपकिंस हॉस्पिटल के इमरजेंसी फिजिशियन डेनियल ब्रेनर का कहना है कि फेफड़ों से सैम्पल लेने को ब्रॉकोएल्विओलर प्रक्रिया कहते हैं। इस दौरान शरीर मेंछोटा सा चीरा लगाकर फेफड़ों से फ्लुड निकाला जाता है।


3- जांच का परफेक्ट न होना
संक्रमण रोग विशेषज्ञ डॉ. प्रिया सम्पतकुमार के मुताबिक, जब जांच बड़े स्तर पर होती है तो कई बार जरूरी सावधानियां नजरअंदाज हो जाती हैं। अमेरिका में बड़ेस्तर पर जांच की शुरुआत बेहद धीमी गति से शुरू हुई है। अब टेस्ट किट का प्रोडक्शनतेजी से बढ़ाया जा रहा है। आलम यह है कि फार्मासिस्ट को जांच करनेके लिए आधिकारिक तौर पर नियुक्त किया गया है। पिछले 5 महीने से कोरोनावायरस इंसानों को संक्रमित कर रहा है इसलिए सटीक जांच सबसे जरूरी पहलू है।इमरजेंसी फिजिशियन डेनियल ब्रेनर का कहना है कि सबसे खतरनाक बात यह है कि लोगों का टेस्ट निगेटिव आने पर वह निश्चिंत हो जाते हैं और वह दूसरों सेमिलना-जुलना शुरू कर देते हैं।

एक्सपर्ट को अब सीरोलॉजिकल टेस्ट से उम्मीदें
वैज्ञानिकों को अब हाल ही में उपलब्ध कराए गए सीरोलॉजिकल टेस्ट से उम्मीदे हैं। इस टेस्ट के जरिए यह देखा जाता है कि इंसान के शरीर में मौजूद एंटीबॉडीज कोरोनावायरस पर किस तरह से असर करेंगी। इस जांच से यह भी पता चलेगा कि इंसान पहले कभी संक्रमित हुआ था नहीं। ऐसे मरीज जिनकी जांच रिपोर्ट निगेटिव आई है उनका भी सीरोलॉजिकल टेस्ट कराया जाएगा।



Download Dainik Bhaskar App to read Latest Hindi News Today
संदिग्ध कोरोना पीड़ित का स्वाब सैम्पल इस तरह से लिया जाता है।


from Dainik Bhaskar https://ift.tt/2VDlfe3

No comments